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January, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कवि आर्त कृत कजली ।।

कजली
हरे रामा ब्रजवीथिन्ह विच बहुरि बाँसुरी बाजे रे हारी ॥
चली बिहाइ कन्त ब्रज बनि तन्हि विकल विरह बौरानी रामा हरे रामा कृष्ण कालिन्दी कूल कदम्ब तर राजे रे हारी ॥
चुम्बति चरन चहकि चंचलि कोई चिबुक चारु चटकीली रामा हरे रामा सुघरि सखी सकुचाति श्याम संग साजे रे हारी ॥
अम्बुज अरुण अधर अति सोहत अली चली अति प्यारी रामा हरे रामा जोहे न जिन्ह जदुवीर ते जनम अकाजे रे हारी ॥
मनमोहन की मिलनि मधुरमुनिमुदित महेश मनावत रामा हरे रामा युग-युग जियें ब्रजराज को विरद विराजे रे हारी ॥