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कवि आर्त कृत एक सुन्‍दर काव्‍य, वित्‍तकोष संस्‍था पर ।।



-  ये जो काव्‍य मैं आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, ये काव्‍य कवि श्री अनिरूद्धमुनि पाण्‍डेय जी ने अपने बैंक के विषय में लिखा था ।
इस काव्‍य की जो सबसे बडी बात है वह ये कि इसमें फैजाबाद क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक का प्रारम्‍भ दर्शाया गया है ।
सभी छन्‍द घनाक्षरी में हैं ।।

(इस छन्‍द में फैजाबाद क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की शुरूआत बताई गयी है)

मिश्रित उपक्रम से '76' में लगा जो तरू
'80' में सितम्‍बर पाँच, फूटी नई कोपली
'ग्राम्‍य बैंक' ग्रन्‍थ्‍ा मे नया अध्‍याय 'फैजाबाद'
जोडने अधीर बाँकुरों की टीम हो चली
गॉंवों का समग्र हो विकास, आस नूतन ले 
कुहू में निशेश सम् इक मशाल जो जली
दीनो, धनहीनो को भी बैंकिंग सिखाके 'आर्त'
हो गयी विख्‍यात गाँव-गाँव व गली-गली ।।1।।

(इस छन्‍द में ग्रामीण बैंक का प्रारम्भिक विकास दर्शित है )

कोछा से किछौछा तक, कहुआ, केदार नगर 
जिले में प्रसार हुआ सरसठ शाखों का 
तिनकों से जाल बना, रोचक सवाल बना 
वानक विशाल बना बिखरे सलाखों का 
खूब जनप्रिय हुआ 'फैजा0 क्षे0 ग्रामीण बैंक' 
सोच किरकिरी भी बना चन्‍द बडी आँखों का 
सौ-सौ रूपयों का गजरमन्‍द ये अबोध 'आर्त'
लेन-देन कर रहा है आज कई लाखों का ।।2।।

(इस छन्‍द में ग्रामीण बैंक के प्रारम्भिक अधिकारियों का वर्णन है )

क्‍यारी की तैयारी की अशोक धूपर साहब ने 
तुंगनाथ जी ने पुष्‍प चुन-चुन लगाये हैं 
आर0 एन0 शाह जी ने पौधों को सयान किया
एम0 ओ0 शाह जी प्रयास कर सुमन खिलायें हैं
जे0 वी0 मलहोत्रा का सहिष्‍णु श्रम कौन भूले
फिर भी कार्य-भार-लू से जब हम मुरझाये हैं
स्‍नेह-नीर सींचकर, नवप्राण फूँकने को 
गुप्‍ता साहब तो सदाबहार बनके आये हैं ।। 3।।

क्‍लीव, निस्‍तेज, श्रमवंचक नहीं हैं, हम
शास्‍त्री, लोकमान्‍य व सुभाष की सन्‍तान हैं
कर्म मेरी पूजा, धर्म व चरित्र निधि मेरी,
'अद्यतन कार्य' मेरे दक्षता-प्रमान हैं
क्‍यों न हो असह्य कार्य भार तो सभी संस्‍थार्थ 
जूझेंगे, कि जिसने सजाये अरमान हैं
साथियों । सकुल सानन्‍द रहें, पर न भूलें,
संस्‍था सहारे मेरे नवल विहान हैं ।।4।।

अधिकारीगण विद्यासिन्‍धु हैं, सयाने हैं
कर्मचारी ओज अनुप्राणित प्रबुद्ध हैं
आत्मिक विकास, सर्वजन हिताय सेवाव्रती
जागृत, सुशील, मिलनसार और शुद्ध हैं
होता है आभास देखकर प्रयास कार्मिकों का 
चेयरमैन साहब भी संतुष्‍ट और मुग्‍ध हैं
सुखद, समृद्ध हो सभी का नव प्रभात प्रभो ।
प्रणत निवेदक 'आर्त' पाण्‍डेय अनिरूद्ध हैं ।।5।।

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