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श्रद्धांजलि - कवि आर्त कृत लघुकथा ।


     बहुत दिन हो गये महाकवि वचन पर कोई काव्‍य या कथा आदि प्रस्‍तुत नहीं कर पाया । अत: आज आपलोगों को कवि 'आर्त' कृत एक बडी ही रोचक कथा सुनाता हूँ । ये कहानी थोडी सी लम्‍बी है अत: इसे कुछ खण्‍डों में क्रम से प्रस्‍तुत करूँगा । आज इस कहानी का पहला चरण प्रस्‍तुत कर रहा हूँ । आशा है आपको यह कहानी पसंद आयेगी । कहानी का शीर्षक है श्रद्धांजलि

श्रद्धांजलि

बिहारी भार्गव ग्रामीण बैंक में चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी था । दस वर्षो के निष्ठा व इमानदारीपूर्ण सेवा के उपरान्त उसे दफ्तरी बना दिया गया था । बिहारी के लिये अपने इकलौते पुत्र विक्रम की शिक्षा व पत्नी साधना की बीमारी के अतिरिक्त इस पृथ्वी पर चिन्ता का और कोई विषय न था । अपने पिता की मृत्यु के दुःखद क्षण वह कब का भुला चुका था । मात्र कक्षा 5 तक पढने के बाद गरीबी व पिता की मृत्यु के कारण उसे अल्पवय में ही शहर जाना पड गया था । बिहारी को अपने पिता की वह बात निरन्तर प्रेरणा मन्त्र की तरह याद रहती - ''बेटा बिहारी ! मैं तुम्हें मझधार में छोडने को मजबूर हूँ । क्या करूँ, कई बार मुझे हृदय की असह्य पीडा का अनुभव है किन्तु आज लगता है, ये मेरी जान लेकर ही जायगी । कहते हैं कि संसार का सूत्र संचालक  वह ईश्वर है जो चराचर का पालक है । निश्चय ही वह तुम्हें भी सहारा देगा । फिर भी यदि तुम्हारे पास शुद्ध आचरण, मीठी व हितकर वाणी, सहिष्णुता , ईमानदारी, परिश्रम व सबके हित की कामना तथा परदुःख कातरता है तो समझो तुमने ईश्वर का नित्य साथ पा लिया है । तुम संसार मे कहीं रहोगे , किसी भी दशा में रहोगे, तुम्हारे चित्त में शान्ति रहेगी व खाने-पहनने की कमी कभी न होगी। जीवन मे अच्छा से अच्छा व अधिक से अधिक पाने की नहीं ।'' और उन्होने सदा के लिये आँखे मूँद ली थीं।  बिहारी ने वैसा ही व्यवहार व आचरण अपनाया । इसी कारण बिशालगंज शाखा पर रहते आठ वर्षों मे वह वरिष्ठ शाखा प्रबन्धक से लेकर छोटे कर्मचारी तक सबको प्रिय था । उसकी किसी से कभी अनबन न हुई । अपने थोडे वेतन से उसने न सिर्फ अपनी गृहस्थी सजायी अपितु गरीब पडोसियों व रिश्तेदारों की मदद भी करता रहता व सबसे एक ही आशीर्वाद चाहता कि उसका विक्रम खूब पढ लिखकर कोई अधिकारी बने । बिहारी प्रायः अपने शाखा प्रबन्धक के अधिकारों का अवलोकन करता -- '' हमारे साहब चाहें तो एक अदना व्यक्ति एक सप्ताह में एक फैक्टी का मालिक बन सकता है । एक गरीब किन्तु होनहार व्यक्ति रातों रात ट्रान्सपोर्ट का स्वामी बन सकता है । कितनी योजनायें , कितने खिन्न चेहरों पर प्रसन्नता लाना । जन सेवा व जन सम्पर्क के लिये इतनी आत्मीयता । हर ग्राहक के मनोभावों का अध्ययन कर तदनुरूप उसे सन्तुष्ट करना । कुछ अधिकार तो मेरे साहब के पास ऐसे हैं जिसके लिये एक जिलाधिकारी भी तरसता होगा । यदि लगन, निष्ठा व ईमानदारी से कार्य करें तो कितना पुनीत पद है । बैंक का वेतन पाते हुए भी व्यक्ति कितना सम्मान , कितनी दुआयें मुफ्त में पा सकता है । क्या मेरा विक्रम  भी कभी इस पद तक....... '' और बिहारी के भावुक नेत्र हृदय -मन्दिर में ही ईश्वर से कृपा याचना करने लगते ।

आज बैंक का स्थापना-दिवस मनाया जा रहा है । अंचल की 22 शाखाओं का संयुक्त समारोह विशालगंज शाखा पर ही आयोजित है और शाखा प्रबन्धक सहित समस्त कर्मचारियों का विश्वास है कि बिहारी के रहते कार्यक्रम की व्यवस्था ससमय और समुचित रहेगी किन्तु बिहारी तो गत 5 दिनों से अवकाश पर है । गत पाँच दिनों की बिहारी की अनुपस्थिति का एहसास शाखा को एक दृष्टि में देखकर ही हो रहा है लेकिन कार्यक्रम में बिहारी का न होना बहुत मुश्किल कर देगा । बिहारी को कैसे भी आज आना होगा । एक सन्देशवाहक बिहारी के घर जाता है किन्‍तु बिहारी की पत्नी की दशा देख उसे कुछ कहने की हिम्मत न हुई । लगता है, अब बिहारी की पत्नी के जीवन की ज्योति चन्द घण्टों में ही बुझ जायेगी । पर , बिहारी के न रहने पर आयोजन का क्या होगा ? बहुत बिचार विमर्श कर उसने बिहारी से कुशल-क्षेम पूँछकर '' आपको साहब याद कर रहे हैं , बहुत आवश्यक कार्य है , सुनकर तुरन्त चले आना '' कहकर बैंक की ओर चल पडा। कैसी विधि की विडम्बना है कि जिसे कोई अभाव नहीं है उसे असीम प्रगति की तृष्णा शान्त बैठने नहीं देती और जो न्यूनतम आवश्यकताओं से भी अपने जीवन को खुशहाल बना सकते हैं उन्हे विविध पारिवारिक समस्याये हँसनें नहीं देतीं । ( इसीलिये कभी-कभी ऐसा लगता है कि ईश्वर का विधान कितना क्रूर है ? मन उसे न तो दीनबन्धु मानना चाहता है और न दयानिधि । वह सर्वशक्तिमान भले ही है किन्तु उसका शासन निरंकुश सा लगता है ) । बिहारी अपने साहब  का आदेश टालने की सोच भी नहीं सकता ।  उसने पत्नी को दवा-पथ्य आदि खिलाकर 'बस थोडी ही देर में आता हूँ ' कहकर शाखा की ओर चल पडा । बिहारी को देखते ही मानों सभी सहकर्मी खिल उठे किन्तु बिहारी सब कुछ करते हुए भी मरणासन्न पड़ी अपनी पत्नी की याद में निरन्तर व्यथित रहा ।
 '' कैसा दैवयोग है ? विक्रम-मेरे सपनों का नायक एम. ए. फाइनल की परीक्षा दे रहा है !  उसे इस घटना की सूचना देना भी उसकी परीक्षा में बाधक सिद्ध होगा । और इधर शाखा पर दो दिवसीय समारोह । हे प्रभु ! मै क्या करूँ । साधना के जीवन की बागडोर अब तुम्हारे ही हाथों है । चाहे बचालो , चाहे उठा लो । मेरा क्या जोर है । '' किन्तु शाम होते -होते बिहारी की आँखों के समक्ष मानों अँधेरा छा गया । बहुत अनुनय विनय करने पर भी वह शाखा से अवकाश न पा सका । देर रात तक साहब लोगों ' के हँसी-ठट्ठे होते रहे किन्तु किसी को भी बिहारी की स्थिति की चिन्ता न रही । रात एक बजे समारोह सम्पन्न होते ही वह घर की ओर चल पडा । यद्यपि सभी ने उसे 'इतनी रात न जाने ' की फर्ज अदायगी की परन्तु कोई  भी उसके साथ उसके घर तक  जाने की न सोच सका । वैसे भी बड़ों के ठहाकों के बीच छोटों की आहें - कराहें दब कर रह जाती हैं । मार्ग में कोई कील बिहारी के पाँव में ऐसी चुभी कि उसे दर्द के कारण मूर्छा आ गयी किन्तु मार्ग में उसकी मदद कौन करे, वह जैसे तैसे घर पहुँचा । उसकी पत्नी की कराह ने उसे अपना दर्द भुला दिया । -
    ''अब कैसी हो ?''
    ''तुम्हारी राह निहार रही थी । अब तुम आ गये हो । मैं ठीक हूँ ।
    ''कुछ खाया पिया न होगा ?''
    ''नहीं, पडोसन ने दिन में आकर एक बार सुध ली थी ।''
    ''कुछ बना दूँ तो खाना चाहोगी ?''
    ''देखो रात अधिक बीत गयी है । अब सो लेते हैं । सुबह देखा....''
किन्तु बिहारी को क्या पता था कि लगातार दर्द के तनाव ने उसके जीवन की डोर तोड दी है । मरते मरते भी वह बिहारी को कष्ट नहीं देना चाहती इसीलिये सोने का नाटक कर के वह चुप हो गयी । दिन भर की भारी थकान के कारण थोडी देर में बिहारी भी सो गया और गहरी नींद आ गयी । आधे घंटे के बाद साधना की बेचैनी असह्य हो गयी । उसने जान लिया कि अब उसे बचना नहीं है फिर भी वह बिहारी की नींद में बाधा नहीं डालना चाहती । कई कई रातें बिहारी ने उसके कारण जाग जागकर बिताये हैं । आज वह अपने प्राणेश्वर को सुख से सोते देखना चाहती थी । मैं तो अपने लाल को कुछ बनते न देख पायी किन्तु प्राणनाथ ! तुम देखना, एक दिन अपना विक्रम पूरे कुल खानदान का नाम रौशन करेगा । आह धर्मराज ! लगातार पाँच वर्षों से मैं मर मर के जी रही हूँ । अब मुझे ले चलो । हे पतिदेव ! हे राम ! मेरे विक्रम को सुखी रखना । अन्तिम समय अपने दिल के टुकडे को नहीं देख ...... पा रही हूँ..... बेटा ! मेरा ..... आशीर्वाद तुम्हारे ..... साथ है । तुम जरूर साहब बनोगे ....... । ईमानदारी और मेहनत से बढकर प्रगति का दूसरा कोई सूत्र नहीं । सदा खुशहाल रहो मेरे लाल ..... ;; और साधना की जीवन-साधना पूर्ण हो गयी । वह अमरलोक के लिये प्रस्थान कर चुकी थी । सुबह उठकर बिहारी ने साधना को मृत देखा । उसकी आँखें छलछला आयीं । तुरन्त विक्रम को सूचना भेजी गयी । 10-15 दिनों की घोर उदासी के बाद संसार की सहज गति के अनुसार सब कुछ सामान्य हो गया !

क्रमश:

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