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श्रद्धांजलि-द्वितीय भाग

कांग्रेच्युलेशन विक्रम ! यू हैव कम्प्लीटेड योर प्रोवेशन पीरियड वेल । और, तुम्हारे साथ-साथ इस मोहनपुर शाखा के लिये भी गर्व की बात है कि प्रोवेशन टाइम में भी तुम्हारे परिश्रम के कारण जोनल मैनेजर साहब ने तुम्हें प्रशस्ति पत्र दिया है । ऑफ कोर्स, यू हैव वेल डन । तुम्हारा भविष्‍य उज्ज्वल हो । हमारी हार्दिक शुभकामनायें तुम्हारे साथ हैं । ये है तुम्हारा प्रशस्ति पत्र और ये रहा तुम्हारा स्थानान्तरण पत्र । आनन्दनगर शाखा अपने नये व तेज तर्रार शाखा प्रबन्धक की राह देख रही है । ईश्वर करे , तुम और नये कीर्तिमान स्थापित करो । आज मोहनपुर शाखा सूनी हो जायगी ..'' कहते कहते वरि. शाखा प्रबन्धक (मोहनपुर शाखा) श्री विकास चक्रवर्ति जी भावुक हो उठे । विक्रम ने साभार दृष्‍टि के साथ उनके चरण छुये और आशीर्वाद लेकर अपनी नई मंजिल हेतु चल पड़ा । विक्रम एम.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर अगले ही वर्ष बैंक ऑफ बड़ौदा मे अधिकारी (पी.ओ.) के पद पर नियुक्त हो गया था । पदग्रहण हेतु उसे मोहनपुर शाखा पर जाना था जहाँ उसे भेजने के समय विहारी ने उसे उसकी माँ की अन्तिम इच्छा पूर्ण करने हेतु धन्यवाद दिया था और उसके उपदेशों को सतत याद रखने हेतु संकल्प दिलाया था । विक्रम तो खुशी के कारण कुछ बोल ही न पाया और पिता के पाँव छूकर चल पड़ा था ।
    90 कि.मी. की यात्रा तय करके विक्रम ठीक 10 बजे आनन्द नगर शाखा पर उपस्थित हुआ । पूर्व शाखा प्रबन्धक को प्रणाम कर विक्रम ने सभी छोटे बड़े कर्मचारियों से हाथ मिलाया व सभी ने अपने नये शाखा प्रबन्धक का सादर अभिवादन किया । तमाम फाइलों व रिकार्ड्स के अवलोकनोपरान्त विक्रम ने समझ लिया कि राजमार्ग से 12 कि.मी. दूर, एक छोटे से कस्बे की इस शाखा को अपने अनुसार विकसित करने हेतु उसे कितना परिश्रम करना है और प्रबन्धतन्त्र की उससे अपेक्षायें कितनी अधिक हैं । इस शाखा पर कोई आना नहीं चाहता होगा । इसीलिये आने के साथ ही लोग जाने की जुगत में लग जाते हैं । फिर , शाखा का क्षेत्र इतना कम क्यों है ? क्या मैं यहाँ कुछ खास कर पाउँगा ? क्या मैं स्वयं को संतुष्‍ट कर सकूँगा ? क्या मेरे स्टाफ साथी मेरे अनुरूप सहयोग करेंगे ? क्या यहाँ के ग्राहक उद्दण्ड , धोखेबाज, घाती, बद्मिजाज तो नहीं होंगे या वस्तुतः इन्हे अपने अनुरूप अब तक कोई अधिकारी नहीं मिला होगा । विभिन्न विचारों में गोते लगाते हुए विक्रम को अपनी स्वर्गीया माँ की बातें याद आने लगीं - ' बेटा ! जिसमें सबके प्रति अपनापन है ; अपने कर्तव्यों के प्रति सदा ध्यान है ; सबसे प्रेम से मिलने व सबको अपने जैसा समझने का सद्भाव है; वाणी में मिठास तथा विचारों में सबके हित की कामना है और अपने मालिक के प्रति पूर्ण वफादारी है, ऐसा चरित्रवान व्यक्ति दुनियाँ में कहीं भी असफल नहीं हो सकता । अपने कर्म और ईश्वर के न्याय पर भरोसा रखो । आदमी से बढकर कुछ नहीं है .... ।

    चार बजे, जब ग्राहकों की भीड़ लगभग समाप्त हो गयी, विक्रम ने स्टाफ साथियों के साथ बैठक कर सभी को अपने विचारों से अवगत कराया -'' साथियों ! इस शाखा पर हमसे पूर्व कई प्रबन्धक आये , जो कि हमसे कई गुना अधिक अनुभवी थे । सबकी अपनी कार्यशैली थी व सभी ने अपने दायित्वों का निर्वहन भी किया किन्तु मेरे पास अनुभव की कोई पूँजी नहीं है । आप सभी से उम्र और अनुभव में कम होते हुए भी मुझे अपने परिश्रम और माँ के आशीर्वाद तथा आप सब के सहयोग पर इतना विश्वास है कि शाखा की तस्वीर बदलनें में अधिक समय नहीं लगेगा । संस्था हमारी माँ है, हमारी धात्री , हमारी जिन्दगी का आधार है । संस्था विकास करेगी तो हम भी विकास करेंगे किन्तु यदि संस्था का अहित हुआ तो हमें कोई बचा नहीं सकता । संस्था से ही हमारा वजूद, हमारी पहचान, हमारा सम्मान है अतः हमारी सम्पूर्ण उर्जा संस्था को समर्पित है । जैसे बूँद बूँद से घडा भर जाता है ; दाना दाना ही राशि बन जाता है और टुकडे टुकडे मिलकर मजबूत जाल बन जाते हैं उसी तरह एक एक ग्राहक हमारी पूँजी हैं । हमे अपने हर ग्राहक का सम्मान करना चाहिये, उनके अपने छोटे, बडे भाई , चाचा, पिता, माँ व बहन की छवि देखनी चाहिये । यदि हमारे विचार शुद्ध हो जायें तो अपार भीड से भी हमें न तो झल्लाहट होगी और न ही कोई परेशानी । हम बहुत परिश्रम करके भी प्रसन्न व सन्तुष्‍ट रहेंगे । अच्छे अधिकारी कर्मचारी को लोग महापुरूष और देवता की भाँति सम्मान देते हैं । हम परिश्रम करके भी अपने ग्राहकों को सन्तुष्‍ट नहीं कर पायेंगे यदि हमारी वाणी में कर्कशता है । अतः वाणी पर संयम रखें व सदा मीठी वाणी बोलें, सभी हमारे सम्मान को विवश होंगे । सर्विस करते हैं धन कमाने हेतु और धनार्जन का लक्ष्य सम्मान , धर्माचरण व मन की शान्ति हेतु होनी चाहिये । स्व के साथ साथ सर्व की चिन्ता करें व मनन करें कि ईश्वर ने हमें एक अच्छा अवसर दिया है इस जीवन को सार्थक करने हेतु । निष्‍ठा व लगन से कार्य करके हमारा स्वार्थ और परमार्थ दोनो सध सकते हैं किन्तु अपने पद का दुरूपयोग न तो हमें सम्मान दिला सकता है और न ही मन की शान्ति । हमें पूर्ण विश्वास है कि आप सब हमारी भावनाओं से अवगत हो गये होंगे और ऐसा कोई व्यवहार नहीं करेंगे जिससे कि आप अपनी व मेंरी दृष्‍टि में गिर जायें । मिश्र जी ! आप हम सभी में सबसे उम्रदराज हैं अतः हम आपसे भी अपेक्षा करते हैं कि आप हम सबको सदा यथोचित मार्गदर्शन करते रहेंगे । कैशियर साहब ! बडे़ बाबू ! मुरली भाई ! (दफ्तरी) आप सभी मेरा सहयोग करें और कुछ भी पूँछना कहना हो , बेहिचक कहें । आइये, संस्था के विकास हेतु एक संकल्प लें । '' और अन्त में सभी ने हँसी, चुटकुलों के बीच ठहाके लगाये । एक खुशनुमा माहौल में सभी ने चाय बिस्कुट लिया और अपने अपने घर गये ।

    किसी भी अधिकारी कर्मचारी हेतु उसका क्षेत्र खुली किताब की भाँति होता है । अच्छे लोगेां की अच्छी चर्चा होती है और बुरे लोगों की बुरी चर्चा , किन्तु चर्चा सबकी होती है । विशेष कर ग्रामीण अंचलों में तो शाम को गाँव के किसी प्रभाव शाली और मिलनसार व्यक्ति के यहाँ जब चौपाल लगती है तो तमाम आफिसों की समीक्षा प्रारम्भ हो जाती है और उस चर्चा में पक्षपात या खुशामद के लिये कोई स्थान नहीं होता । आजकल तो आनन्दनगर के नये साहब ही लोगों की चर्चा के मुख्य विषय हो गये हैं । आज मैनेजर साहब ने शाखा पर एक ग्राहक गोष्‍ठी की थी और गोष्‍ठी में हर ग्राहक के प्रति उनके सम्बोधन और सम्मान की भावना पर लोग फूले नहीं समा रहे थे । गाँव के सबसे बुजुर्ग सदस्य मदनलाल त्रिपाठी को गोष्‍ठी में मैनेजर साहब के द्वारा , उनके पाँव छूकर उन्हें अपने बगल कुर्सी पर बैठाना और वरिष्‍ठ ग्राहक के रूप में सम्मानित करना लोगों को बहुत प्रभावित कर रहा था । आज की चौपाल में गाँव वालों के लिये चर्चा का मुख्य विषय मिल गया था । बौद्धिक और शैक्षिक स्तर के मिले जुले लोगों की एक टोली ने चर्चा शुरू की:-
    ''आज तो मैनेजर साहब ने हमारा दिल जीत लिया । इतने उँचे पद पर रहकर भी बुजुर्गों के प्रति सम्मान की ये भावना । महान व्यक्ति के यही लक्षण होते हैं । यदि देश के पचास प्रतिशत अधिकारी इस प्रकार हो जायें तो देश खुशहाल हो जाय लेकिन ।......''
    '' हम कही थै चाचा! हम सबकी किस्मत से अइसन अधिकारी आवा है । अबकी ई बैंक नम्बर एक पै जाई, देखि लिहौ....''
    '' सही कह रहे हो मोती ! ऐसा अधिकारी आना ....... हाउ ग्रट सोल! आफॅ कोर्स , वी आर फारचुनेट ।''
    साहब ऐसा ही चाहिए । सब से प्रेम से मिलना , किसी को भी कड़वी बात न कहना , सबकी समस्या सुनना और बिना विलम्ब किये यथा शीघ्र समाधान करना, काम होने लायक न हो तो भी समझा-बुझाकर वापस करना, सबको भइया जी, चाचा जी, बाबू जी, माँ जी कहकर सम्मान से सम्बोधित करना, कभी क्रोध या आलस न करना तथा बैंक हितों के प्रति सदा सजग रहना-वास्तव में ऐसे ही मनुष्‍यों में देवता हुआ करते हैं । कौआ किसी का क्या छीनता है या कोयल क्या दे देती है ? इसी वाणी में वशीकरण मन्त्र है और इसी में जहर का तीखापन । ईश्वर करे , ये साहब यहाँ दस साल तक रहें । भगवान उन्हे घर -परिवार सहित सदा सुखी रखें ।''

    कहते हैं, पंच में परमेश्वर का निवास होता है । कई लोगों की दुआएँ या बददुआएँ , थोड़ा थोड़ा पुण्य या थोडा थोडा पाप संचित होते होते एक दिन जीवन को स्वग्र या नरक बना देता है ।  वाणी में तो कोई दरिद्र लगा नहीं है, फिर मीठी व सर्वग्राह्य वाणी ही क्यों न बोले । जो रूक्ष व्यवहार , जो कदाचार हमें स्वीकार्य नहीं वह हम दूसरों के साथ क्यों करें ? जीवन का अन्तिम सत्य यदि मृत्यु ही है तो उसके आने से पूर्व हम इस जीवन वाटिका को क्यों न महका लें । विक्रम साहब की निष्‍ठा, अथक परिश्रम और सब के प्रति उनके अच्छे व्यवहार का ही परिणाम था कि इस वर्ष आनन्द नगर शाखा ने उत्कृष्‍ट कार्य निष्‍पादन में प्रथम स्थान प्राप्त किया ! पुरस्कार वितरण समारोह अंचल कार्यालय पर ही नियत किया गया जिसमें अपने साहब को सम्मानित होते देखने के  लिये आनन्दनगर शाखा के कई ग्राहक भी पहुँचे । विक्रम को इस सम्मान में अपनी माँ का आशीर्वाद व पूज्य पिता जी का अद्भुत त्याग स्पष्‍ट रूप से परिलक्षित हो रहा था ।
    यद्यपि कुछ र्इर्ष्‍यालु लोगों को विक्रम की यह उपलब्धि खल रही थी किन्तु अपने मृदु व्यवहार व उदात्त चरित्र के कारण विक्रम लगभग सभी लोगों को प्रिय था । अन्ततः वह घडी आ गयी जब बिक्रम को अंचल-प्रबन्धक श्री नरेन्द्र शाह ने , मंच पर आकर कुछ सम्बोधित करने हेतु बुलाया । विक्रम के मंच पर आते ही पूरा पाण्डाल तालियों की गडगडाहट से गूँज उठा । एक सीधा, अत्यन्त सरल किन्तु अदम्य साहस से भरपूर - ओजस्वी लडका । विक्रम ने हाथ में माइक लिया और वरिष्‍ठ व मंचस्थ अधिकारियों का सम्मान करके बोलना प्रारम्भ किया:- '' इस जीवन -लतिका पर यदि मकरन्द युक्त पुष्‍प आया है तो इठलाइये मत , बल्कि निरन्तर याद रखें कि किसी माली ने इसका अविराम सिंचन व पोषण करके इसे इस योग्य बनाया । यदि हम कमल बनकर आज महक रहे हैं तो इसका श्रेय स्थूल रूप में उस पंकिल भूमि को और सूक्ष्म रूप मे प्रकृति धात्री को है जिनके बिना मेरा कोई अस्तित्व न होता । इस जग वाटिका को सजाने हेतु हम स्वयं को उर्वरक बना दें; फिर देखें कैसी अद्भुत शान्ति , कैसा सन्तोष मिलता है । कभी न भूलें कि हम क्यों ; किससे , कौन और कितना हैं । सभी एक ही ईश्वर की सन्तान हैं अतः सबको बराबर सम्मान का हक है फिर भी समाज मे इतनी विसंगति, इतनी विषमता क्यों हैं ? इसके कारण पर विचार करें तो स्वयं से ही उत्तर मिलता है कि समय पाकर भी जिसने स्वयं को सवाँरा नहीं , जिसने समय, पद व संसाधनो का दुरूपयोग किया एक दिन वही समय उसे कहीं का नहीं छोडता । आज यह पुरस्कार हमें और अधिक उर्जस्वित और अनुप्राणित करेगा जिससे हम संस्था को विकसित करने मे किसी भी सीमा तक कष्‍ट झेलने और परिश्रम करने हेतु कृतसंकल्प होंगे । हमारे क्षेत्र से आये हुए असंख्य ग्राहकों का हमारे प्रति जो स्नेह दिख रहा है उससे बडा पुरस्कार और क्या होगा ? यह उपलब्धि हमारे स्टाफ साथियों के अथक परिश्रम व हार्दिक सहयोग और हमारे तमाम ग्राहकों के आशीर्वाद का परिणाम है । आज मेरे पूज्य पिताजी का त्याग, उनकी तपस्या फलीभूत हुई है और सम्भवतः उनकी साधना तरू का ये फल मेरी माँ जी की आत्मा को पूर्ण शान्ति प्रदान कर रहा होगा । उनकी ओर से मेरी माँ को यह सच्ची श्रद्धांजलि......कहते कहते विक्रम की आँखें डबडबा आयीं । पुनः विक्रम ने अपनी माँ की बीमारी , पिता श्री विहारी जी के परिश्रम व त्याग तथा उनके प्रेरक शब्दों की कहानी संक्षेप में सबको सुनायी जिससे अंचल प्रबन्धक महोदय भी आँसू रोक न सके । विक्रम पुरस्कार लेकर मंच से वापस आ रहा था और तालियों की गड़गड़ाहट   मानो उसकी उपलब्धि का गौरव गान कर रही थी । लोग कह उठे ''वस्तुतः विक्रम ने अपनी माँ को उनके अनुरूप उचित श्रद्धांजलि दी है । भगवान के घर देर भले है किन्तु अन्धेर नहीं है । समय आने पर बबूल तरू काँटों से घिर जाता है और रसाल के वृक्ष में सुस्वाद आम्रफल लद जाते हैं । यही कर्म विपाक है । यही ईश्वर का न्याय है ।

।। कवि 'आर्त' कृत श्रद्धांजलि लघुकथा ।।

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