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September, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जब चाहेंगे श्रीराम सकल जगजाल छूट जाएँगे - कवि 'आर्त' कृत काव्‍य

हम कोटि जतन कर लें, दु:खों से मुक्‍त न हो पाएँगे । जब चाहेंगे श्रीराम सकल जगजाल छूट जाऍंगे ।।
है कौन कि जिसने चाहा, उस पर पडे आपदा भारी हर क्षण सुख सुविधाओं की कामना करता हर संसारी लेकिन बबूल के वृक्ष कभी न आम सरस आएँगे जब चाहेंगे श्रीराम सकल जगजाल छूट जाऍंगे ।। 
आलम्‍बन यदि कमजोर, निरा श्रम से क्‍या हो सकता है जितना जागतिक प्रसार, हृदय उतना ही खो सकता है जागेगी अन्‍तर्ज्‍योति, विषय से जब हम उकतायेंगे जब चाहेंगे श्रीराम सकल जगजाल छूट जाऍंगे ।। 
नरसी गरीब के कीर्तन पर घनश्‍याम बरसते देखा राजाधिराज को भी बस इक सुत हेतु तरसते देखा जिनमें विषाद के नीर, मेघ सुख कैसे बरसायेंगे जब चाहेंगे श्रीराम सकल जगजाल छूट जाऍंगे ।।
शुभ कर्मो से शबरी, भुशुण्डि युग-युग पूजे जायेंगे दसकण्‍ठ, कंस, दुर्योधन हर युग में थूके जायेंगे हैं 'आर्त' तदपि हम मुदित निरन्‍तर भक्ति गीत गायेंगे ।।
जब चाहेंगे श्रीराम सकल जगजाल छूट जाऍंगे ।।
-- 
कवि 'आर्त' कृत नीराजन भजन संग्रह से साभार स्‍वीकृत ।।

कवि आर्त कृत एक सुन्‍दर काव्‍य, वित्‍तकोष संस्‍था पर ।।

-  ये जो काव्‍य मैं आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, ये काव्‍य कवि श्री अनिरूद्धमुनि पाण्‍डेय जी ने अपने बैंक के विषय में लिखा था ।
इस काव्‍य की जो सबसे बडी बात है वह ये कि इसमें फैजाबाद क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक का प्रारम्‍भ दर्शाया गया है । सभी छन्‍द घनाक्षरी में हैं ।।
(इस छन्‍द में फैजाबाद क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की शुरूआत बताई गयी है)
मिश्रित उपक्रम से '76' में लगा जो तरू '80' में सितम्‍बर पाँच, फूटी नई कोपली 'ग्राम्‍य बैंक' ग्रन्‍थ्‍ा मे नया अध्‍याय 'फैजाबाद' जोडने अधीर बाँकुरों की टीम हो चली गॉंवों का समग्र हो विकास, आस नूतन ले  कुहू में निशेश सम् इक मशाल जो जली दीनो, धनहीनो को भी बैंकिंग सिखाके 'आर्त' हो गयी विख्‍यात गाँव-गाँव व गली-गली ।।1।।
(इस छन्‍द में ग्रामीण बैंक का प्रारम्भिक विकास दर्शित है )
कोछा से किछौछा तक, कहुआ, केदार नगर  जिले में प्रसार हुआ सरसठ शाखों का  तिनकों से जाल बना, रोचक सवाल बना  वानक विशाल बना बिखरे सलाखों का  खूब जनप्रिय हुआ 'फैजा0 क्षे0 ग्रामीण बैंक'  सोच किरकिरी भी बना चन्‍द बडी आँखों का  सौ-सौ रूपयों का गजरमन्‍…

शरारती बचपन- देखिये और हँसिये ।।

ये मेरा भतीजा है ।
मेरे दोस्‍त का बेटा ।।
आप इसे देखेंगे तो हँसते-हँसते लोट पोट हो जाएँगे ।।

प्रभु , फिर हो ऐसा परिवर्तन-कवि 'आर्त' कृत काव्‍य

-- प्रभु ! फिर हो ऐसा परिवर्तन ।

कपट, स्‍वार्थ, मात्‍सर्य, त्‍यागकर शुद्ध सत्‍वमय बने जगत्-जन ।
यथा लाभ से तुष्‍ट-पुष्‍ट हों, सत्‍पथ की पहचान करें
हों कृतज्ञ, कर्तव्‍य-बोध हो, श्रमजीवी का मान करें
अनुदिन गत-चिन्‍ता, चिन्‍तनरत करें आत्‍म-परिचय हित मन्‍थन ।।

व्‍यसन-विलास न हो अभीष्‍ट, न अतृप्‍य कांक्षा हो धन की
और न भ्रमित करे नर-वर को भँवर-कामिनी कंचन की
अब न बने गौरव-प्रतीक उँचे प्रासाद, अनैतिक वाहन ।।

अन्‍यायोपार्जक, श्रमवंचक, परधनहारी नित निन्‍दित हों
ढोंगी, लम्‍पट सकुल नष्‍ट हों, पर-उपकारी जग वन्दित हों
'जियो व जीने दो' का शुचि-सन्‍देश झरे निर्मल तारायण ।।

पशुवत् उदरपूर्ति, प्रजनन तक ही न रहे ध्‍येय जीवन का
कभी शान्‍त, नीरव, विविक्‍त हो योग करें अन्‍तर्मन का
विदुष, विपश्चित् सोंचें को हम? कुत:? कहाँ जाना फिर तज तन ।।

मातृ,पितृ, गुरू और अतिथि को देव-सरिस अति आदर दें
सुधी,मनीषी, सन्‍त, साधकों को सम्‍मान, समादर दें
त्‍याग वितण्‍डावाद सुहृदजन करें नये युग का अभिवादन ।।

पर हा ! अनुपम कृति विरंचि की क्‍यों कर विषयी-श्‍वान हो गयी
भौतिकता के अंधड में मानवता जाने कहाँ खो गई
बहुना किं…

हिन्‍द से इतना ये आनन्‍द प्‍यार करता है । मेरी नयी कविता ।।

आज सुबह-सुबह मेरे मस्तिष्‍क में चंद पंक्तियाँ उठीं और मैनें उन्‍हे काव्‍य का रूप दे दिया ।  अब निर्णय आप पर है, काव्‍य के भावों आंकलन करके अपने विचार प्रकट कीजिये । 
अपना तन प्राण धन सब‍कुछ निसार करता है । इतना ये ''आनन्‍द'' इस भारत से प्‍यार करता है ।।
चोर जितनी कंचन की, कामिनी आभूषण की भक्‍त ज्‍यूँ कीर्तन की चाहत बेशुमार करता है  इतना ही ''आनन्‍द'' इस भारत से प्‍यार करता है ।।
गाय जितन बछडे का, सूकरी ज्‍यूँ कचडे का ज्‍यूँ पिचाली पचडे पर इख्तियार करता है बस यूँ ही ''आनन्‍द'' इस भारत से प्‍यार करता है ।।
वेदपाठी संहिता पर, पुत्र जैसे निज पिता पर श्रेष्‍ठ कवि निज काव्‍य पर ज्‍यूँ ऐतबार करता है ऐसे ही ''आनन्‍द'' इस भारत से प्यार करता है ।।
नौजवान भय तजकर चढ चले जब शत्रु उपर और उनके खून से अपना श्रृंगार करता है  हाँ यूँ ही ''आनन्‍द'' इस भारत से प्यार करता है ।।
देश को खुशहाल करने, लो चला ''आनन्‍द'' मरने कौन आता संग मेरे यह पुकार करता है  इस तरह ''आनन्‍द'' बस भारत से प्‍यार करता है ।।
जय ह…

धीरे बोलिये, दीवार के भी कान होते हैं ।

हम जब भी किसी की कानाफूसी कर रहे होते हैं या कोई ऐसी बात कर रहे होते हैं जिसे हम अपने तक ही सीमित रखना चाहते हैं तो हम कितने मंद स्‍वर में बात करते हैं इसका अनुभव आप सब का होगा ही । अब ऐसी परिस्थिति में जब आप परम एकांत में ही क्यूँ न बात कर रहे हों या किसी ऐसी काल कोठरी में जिसके कि बाहर आवाज का जाना असम्‍भव हो तब भी इस तरह की गूढ बातें करते समय जब सामने वाला थोडी तेज आवाज में बात करने लगता है तो त्‍वरित ही आपके मुख से अनायास ही निकल जाता है - भाई जरा धीरे बोलो क्‍यूँकि दीवालों के भी कान होते हैं ।
अब सच बताइयेगा इस वाक्‍य को बोलने से पहले क्‍या आप एक भी बार कुछ भी सोंचते हैं- मसलन यह बात किसने सबसे पहले कही । इस विचार का आविष्‍कार सबसे पहले किस देश में हुआ ।  या यह लैटिन और फ्रेच के फला शब्‍दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ फला है । नहीं न ,  इसीलिये तो ये सूक्ति आज भी शत प्रतिशत भारतीय है। अन्‍यथा अगर कहीं इसपर भी कोई समाजशास्‍त्री या तर्कशास्त्री की नजर पड जाती तो आज यह उक्ति भी विदेशों द्वारा प्रतिपादित बता दी जाती । जैसा कि समाजशास्‍त्र अंग्रेजी के शब्‍द सोसियोलाजी का हिन्‍दी रूपान्‍त…