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May, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

देश तो बस नेताओं का है ।।

देश तो बस नेताओं का है  ।।

राजनीति की पंकिल धारा, मध्‍य फंसा ये देश हमारा
नेताओं की ठाट हो रही, धन की बँदरबाँट हो रही
जनता पा सकती न टका है ।।
देश तो बस नेताओं का है  ।।

हर दिन महगाई बढती है , सब जनता के सिर चढती है
हम ठहरे गॉंधी के बूटे, वोट उन्‍हे जो कसकर लूटे
सत्‍याग्रह यूँ ही होता है ।।
देश तो बस नेताओं का है  ।।

जन्‍मभूमि पर बने बाबरी, राम रहें जाकर घर शबरी
ये मुद्दा हर रोज उछलता, इससे वोट बैंक है फलता
घाव पुराना, अब दुखता है ।।
देश तो बस नेताओं का है  ।।

न्‍याय बिक रहा है पैसों पर, धर्म बना खाली आडम्‍बर
टूटे भगत, सुभाष के सपने, चल ''आनन्‍द'' चलें घर अपने
अब इस देश यही होता है ।।
देश तो बस नेताओं का है  ।।

सरयू तट का एक विहंगम अवलोकन ।।

संस्‍कृत में देखें
आज आपलोगों को पवित्र श्रृंगीऋषि धाम के पास से बहती हुई सरयू नदी का दर्शन कराता हूं ।। ये चित्र मैने अपने नाकिया एन 73 से खींचे हैं । मेरा यह प्रयास कैसा रहा जरूर बताइयेगा ।
श्रृंगीऋषि धाम के बारे में और अधिक जानने के लियेयहां क्लिक करें

सरयू तट


आशा है मेरा ये प्रयास आपको अच्‍छा लगा होगा ।

आपस का ये द्वेष तुम्हारा देश को न गुलाम कर जाए ।।

कवि आर्त का बलिदानी वीरों हेतु समर्पित यह सुन्‍दर काव्‍य आप सब के समक्ष प्रस्‍तुत करते हुए हार्दिक शान्ति प्राप्‍त कर रहा हूं ।
इसी बहाने अपने देश के कर्णधारों को प्रतिदिन याद कर लिया करता हूं, यही हमारी उन वीर पूर्वजों को श्रद्धान्‍जलि है ।
जय हिन्‍द ।।

बढो वीर निज भुजबल तोलो ऐसा फिर न होने पाए
आपस का ये द्वेष तुम्हारा देश को न गुलाम कर जाए ।।

जिन अरमानों को लेकर लाखों वीरों ने प्राण गवाये
असह्य कष्‍ट सहकर भी हंसकर बैरी सम्‍मुख शीश कटाये
उन पुनीत भावों के उर में क्यों स्‍वारथ के शूल चुभाये ।।
आपस का ये द्वेष तुम्हारा देश को न गुलाम कर जाए ।।

बलिदानी वीरों को रखना याद ये है कर्तव्‍य तुम्‍हारा
जिन्होने अपनी भारत मॉं को गोरों के अंकुश से उबारा
कोई विदेशी क्रूर न फिर से हरिभक्‍तों पर हुक्‍म चलाये ।।
आपस का ये द्वेष तुम्हारा देश को न गुलाम कर जाए ।।

खुदीराम, बलवन्‍त, भगतसिंह, सावरकर, आजाद सयाने
मचल उठे सुखदेव, राजगुरू मातृभूमि को शीश चढाने
तु कृतघ्‍न क्‍यूं लाल, बाल, शास्‍त्री जी के उपकार भुलाये ।।
आपस का ये द्वेष तुम्हारा देश को न गुलाम कर जाए ।।

रामकृष्‍ण, गौतम की धरती बच्च…

आप सभी सुधी पाठक मेरी कही हुई बातों पर गौर करके ये बताइये कि मैने भला क्‍या गलत कहा ।।

हरिहर पद रति मति न कुतर्की, तिन्‍ह कहं विमल कथा रघुवर की ।।- रामचरित मानस

                सनातनी परम्परा रही है अपने दुश्‍मनों का भी अहित न विचारना । युद्ध क्षेत्र में विपक्ष सेना के घायलों को भी मरहम का लेप और जीवन दायिनी औषधियॉं देना इस सनातन हिन्‍दु धर्म की ही प्रारम्भिक परम्‍परा रही है । अपना अहित विचारने वालों तक को अपनी मृत्‍यु का सहज मार्ग बता देना इसी धर्म ने सिखाया । सत्‍य व न्‍याय के पालन के लिये अपने पुत्र तक को राजगद्दी पर न बिठाकर किसी साधारण सी जनता को राजसिंहासन दे देना भी हिन्‍दू परंपरा का ही अंग है । अपने आखिरी क्षणों में भी दूसरों की भलाई के लिये उपदेश करना कि जिनके हां‍थों शरशैरय्या मिली हो उनका भी भला सोंचना हिन्‍दू धर्म ने ही सिखाया । अरे मनुष्‍य क्‍या है और मानवता क्‍या होती है इसकी भी शिक्षा सर्वप्रथम इसी धर्म ने दी । जहां रावण जैसा महापापी अतुलित बलधारी राक्षस भी वेदों पर भाष्‍य लिखता है । उसे विरोध राम, विष्‍णु, ब्रह्मा और इन्‍द्रादि देवताओं से है पर धर्मग्रन्‍थों से कोई शिकायत नहीं ।
इसी सत्‍य सनातन धर्म के ही कुछ वाहक जो पथभ्रष्‍ट हो चुके हैं, उन्‍हे आजकल कु…

सोम- लता या मशरूम

यूं ही ब्‍लाग्‍स को टटोलते हुए आज मै एक बडे ही प्‍यार ब्‍लाग पर पहुंच गया जहां श्रीमद्भगवद्गीता के विषय में एक लेख लिखा हुआ था । पढकर बहुत ही अच्‍छा लगा । पर उसी ब्‍लाग पर मैंने एक पोस्‍ट और देखी जो सोमलता विषय पर थी । वहां सोम को एक फंफूद या मशरूम बताया गया है । हालांकि इस पोस्‍ट में लेखक का कोई दुराग्रह नहीं दिखा , पोस्‍ट के लेखक ने कुछ वैज्ञानिकों द्वारा दिये गये तथ्यों को ही उद्धृत किया है । यहां मैं उस पोस्‍ट की लिंक दे रहा हूं , आप स्‍वयं इसे पढ सकते हैं कहीं यही तो सोम नहीं  इस पोस्‍ट को पढकर आप भी उन प्रमत्‍त वैज्ञानिकों के द्वारा दिये गये उल्‍टे-सीधे तर्क पढ सकते हैं ।
           उनमें से कुछ को मैं यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं ।।
डॉ0 वाट ने कोंकण, कर्नाटक, सिंहभूम, रांची, पुरी और बंगाल में मिलने वाले तथा आरोही (ट्रेलिंग या ट्वाइनिंग) झाडी के रूप में फैलने वाले 'सारकोटेस्‍टेम्‍मा एसिडम' (रौक्‍स) वोगृ (मदारकुल) को सोम बतलाया है ।
कुछ विद्वानों ने पेरिप्‍लोका एफाइल्‍लाडेकने मदारकुल को सोम माना है । पंजाब में इसका नाम 'तरी' तथा बंबई में 'बुराये' …

प्रेम मगन मन भजन करे राम हरे श्री कृष्‍ण हरे ।

प्रेम मगन मन भजन करे राम हरे श्री कृष्‍णहरे ।

मानवता का भाव जगा उर धन दौलत में शान्ति कहां
श्रम सींकर के मोल मिले जो उतने में आनन्‍द मना
किसके लिये भंडार भरे, राम हरे श्री कृष्‍ण हरे ।।

पानी का बुलबुला ये जीवन कब फुट जाये कौन कहे
कहीं बुढापा कहीं ब्‍याधि से संतत पीडित जीव रहे
जग में कितने कष्‍ट भरे राम हरे श्री कृष्‍ण हरे ।।

काल बली का एक तमाचा माया हाट छुडायेगा
जिस तन पर फूला है इक दिन माटी में मिल जायेगा
क्‍यों बल का अभिमान करे राम हरे श्री कृष्‍ण हरे ।।

पाप, कपट, छल, अनाचार में जनम अमोलक खोय रहा
नारायण को भूल के मूरख पाप की गठरी ढोय रहा
परमेश्‍वर से क्‍यूं न डरे राम हरे श्री कृष्‍ण हरे ।।

कौन यहां पर तेरा मेरा जग दो दिन का मेला है
झूठे जग के रिस्‍ते नाते जाता जीव अकेला है
इस पर 'आर्त' विचार करे राम हरे श्री कृष्‍ण हरे ।।

महाकवि 'आर्त' कृत नीराजन भजन संग्रह से साभार गृहीत ।।

फिर वही ढाक के तीन पात

आज-कल के अखबार में प्राय: दो मुद्दे नियमित मिल जाते हैं । एक तो कसाब के प्रति राजनीतिकों की राजनीति का विषय और दूसरा भारत-पाकिस्‍तान वार्ता । इन दोनों ही मुद्दों पर भारतीयों की राय लगभग एक जैसी ही है । कोई भी सच्चा भारतीय ये नहीं चाहता कि किसी भी कीमत पर अजमल कसाब को किसी भी कीमत पर जीवन दान दिया जाए और मेरे मत से अब कोई भी भारतीय पाकिस्‍तान से वार्ता भी नहीं चाहता । चाहे भी क्‍यूं, एक तो वह है जिसने हमारे कितने ही भाइयों को मारा और अभी भी जेल में मजे कर रहा है और दूसरा इन जैसों का भारत के प्रति उत्‍पादन करने वाला देश है ।
कितनी ही बार भारत ने पाकिस्‍तान से बात का विकल्‍प खुला रखा, बातें हुई भी पर फिर वही ढाक के तीन पात  न कभी पाकिस्‍तान ने सीमा पार से आतंकवाद कम किया और न ही कश्‍मीर की मांग छोडी । हद तो तब हो गई जब मुंबई हमले के आरोपियों पर कार्यवाही करने के बदले उसने उल्‍टे ही कई आरोप भारत के ही सिर मढ दिये ।
अब इसे देश का दुर्भाग्‍य ही कहेंगे कि हमारे वरिष्‍ठ नेताओं को आज भी पाकिस्‍तान से उम्‍मीदें हैं । कुत्‍ते की जो पूंछ आज तक सीधी न हो सकी उसे ये सीधा करके ही छोडेंगे । जाने कब ह…

है फटी लंगोटी भारती के लाल की ।।

आज की गंदी राजनीति में फंस कर बेहाल हुए देश की दशा का वर्णन बडे ही मार्मिक ढंग से कवि आर्त ने अपनी इन पंक्तियों में किया है ।
प्रस्‍तुत पंक्तियां महाकवि अनिरूद्धमुनि पाण्‍डेय 'आर्त' कृत हनुमच्‍चरितमंजरी महाकाव्‍य से ली गयी हैं ।

कहां वो सुराज्‍य जहां श्‍वान को भी मिले न्‍याय
आज न्‍याय-देवि बिके धनिकों के हॉंथ हैं ।
मन्‍द पडी धर्म, सत्‍य, नीति की परम्‍परायें
कर रहे ठिठोली तप-साधना के साथ हैं ।
परशीलहारी दुराचारिये निशंक घूमें
किन्‍तु पतिरखवारे ठाढे नतमाथ हैं ।
चाह महाकाल की कि चाल कलिकाल की
अचम्‍भा, हाय!  कौन सोच मौन विश्‍वनाथ हैं ।।

सत्‍य अनुरागी हैं उटज में अभावग्रस्‍त
किन्‍तु दूर से ही दिखें कोठियां दलाल की ।
चोरी, घूसखोरी, बरजोरी में ही बरकत है
कोई ब्‍यर्थ क्‍यूं करे पढाई बीस साल की ।
पौंडी-पौंडी उठने का कौन इन्‍तजार करे
वंचकों को चाहिये उठान तत्‍काल की ।
दूर से दमकता दुशाला दगाबाजियों का
'आर्त' है फटी लंगोटी भारती के लाल की ।।

राजनीति की पुनीत वीथि आज पंकिल है
क्षुद्र स्‍वार्थ-साधना में लीन ये जहान है ।
धूर्त, नीच, लम्‍पट, सदैव जो अनीतिरत
लोक-धारणा मे वही बन रह…

सनातन धर्म के प्राण, वेदों के विषय में कुछ रोचक तथ्‍य- अवश्‍य पढें ।।

सनातन धर्म का प्राणस्‍वरूप, विश्‍व का महानतम, आदि ग्रन्‍थ वेद केवल सनातन हिन्‍दू धर्म का ही नहीं अपितु विश्‍व के सम्‍पूर्ण धर्मों का मूल है । ''वेदोखिलो धर्ममूलम्''  अर्थात् वेदो से ही सम्‍पूर्ण धर्मों की उत्पत्ति हुई है । इस विषय पर श्रद्धा रखने वाले जानकार लोग इस बात को विधिवत जानते व मानते हैं पर जिन बन्‍धुओं की जिज्ञासा होगी कि वेदों से ही सम्‍पूर्ण धर्मों की उत्‍पत्ति कैसे हुई, वे मुझे ईमेल से सूचित करें, मैं उनकी शंकाओं का समाधान मैं अपने अगले लेख में प्रकाशित कर दूंगा ।
              आज के इस लेख में वेदों, खासकर ऋगवेद के विषय में कुछ महत्‍वपूर्ण एवं रोचक तथ्‍यों का उद्घाटन करने जा रहा हूं । ये विषय हर उस व्‍यक्ति को जानने चाहिये जो धर्म के विषय में जानना चाहता है , कहा भी है- ''धर्मजिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुति:''  अर्थात् धर्म के जिज्ञासुओं के लिये वेद परम प्रमाण है।

              वास्‍तविकता में वेदों की उत्‍पत्ति तभी हो गई थी जब कि इस श्रृष्टि की उत्‍पत्ति हुई । किन्‍तु पाश्‍चात्‍य दुराग्रहियों के द्वारा उद…

महफिलों मे फिर गजल पढने लगा हूं मैं ।।

हर गजल की तरह ही मेरी यह गजल भी उसी एक शक्‍स को समर्पित है जिसके लिये मैने ये गजल लिखी थी । 
आज भी वो मेरे साथ है पर फिर भी मेरे साथ नहीं है ।  डरता हूं मैं उसको खो देने से पर यह भी सच है कि मैं कभी उसे पा भी तो नहीं सका ।  खैर मेरी कहानी तो छोडिये, आप तो बस ये गजल पढिये और बताइये कैसी लगी आपको । 




जाने फिर क्‍यूं आप पर मरने लगा हूं मैं 
अपने ख्‍वाबों रंग फिर भरने लगा हूं मैं ।। 


फिर हंसी लगने लगे बागान के हर गुल 
हर कली से इश्‍क फिर करने लगा हूं मैं ।। 


रोज उनको याद कर जी लेता हूं सदियां 
और हर इक पल में फिर मरने लगा हूं मैं ।।


ऐ गमे तनहाई मेरे पास न आओ 
अब के  फिर से दर्द से डरने लगा हूं मैं ।। 

देखता हूं यार की सूरत पयालों में 
मैकदे में ही बसर करने लगा हूं मैं ।। 


बन गया मेरा खुदा वो आज मेरा दोस्‍त 
अब इबादत उसकी ही करने लगा हूं मैं ।। 


ऐ के शायद जग गया फिर से गमे ''आनन्‍द''
महफिलों मे फिर गजल पढने लगा हूं मैं ।।

अपनी कुनीतियो की पुष्टि के लिए देवताओं पर आरोप करने वाले कुंठितों पर कुठाराघात

आज ही नहीं अपतु हर सामाजिक परिवेश में कुछ ना कुछ ऐसे कुंठित भावनाओं से ग्रस्त लोग होते ही है जो अपनी वासनाओं या कमियों की पुष्टि के लिए सनातन धर्म तथा हिन्दू देवों द्वारा किये गए कार्यों का उल्लेख करने से नहीं चूकते हैं !!

इनकी कुछ वासनाएं पूरी हो जाएं और समाज इन्हें दोषी ना कह पाए इसलिए ये देवताओं के चरित्र तथा उनके किये कार्यों का बड़ी ही सहजता से उद्धरण दे देते हैं , और इन्हें इसका पश्चाताप तो क्या होगा उलटे इसमें इनका मानस प्रफुल्लित होता है !
आज कल ब्लॉग जगत पर भी ऐसे ही कुछ अवसाद से ग्रस्त लोगों के लेख आने लगे हैं!
कुछ दिन तक तो उनके blogs पर नम्र टिप्पड़ियां कर के उन्हें समझाता रहा पर इसे उन्होंने कमजोरी मानते हुए हिन्दू धर्म पर कुठाराघात और भी तेज कर दिया !
मै उनका नाम यहाँ उल्लिखित नहीं कर रहा हूँ पर अगर वो ये लेख पढेंगे तो अवश्य ही कुंठित होंगे और भगवत प्रेमी जन इस लेख से हर्षित होंगे इसी आशा के साथ इस लेख का प्रकाशन कर रहा हूँ !! आप सब की टिप्पड़ियों से ही मेरे परिश्रम के फल का  पता चल जाएगा !!


हालांकि हम जिन पुस्तकों को पढ़ते है उनमे से कुछ पर  कभी कभार श्रद्धा नहीं भी जग पा…

कोई भी ग्रन्‍थ अप्रासंगिक नहीं है अपितु हमारे विचार ही अप्रासंगिक हैं।।- भाग -2

प्रिय महक जी
आपकी शेष शंकाओं का समाधान प्रस्‍तुत कर र‍हा हूं।
आशा है आप इन पर भी अपने विचारों को पुष्‍ट कर पाएंगे।।

आपकी अगली शंका है कि मनुस्‍मृति में मांस भक्षण निशिद्ध है 5,51 मगर फिर भी प्रतिदिन मांस भक्षण करने वालों के लिये अनुचित नहीं कहा गया है 5,30 ।।
इस विषय में भी आपकी शंका अन्‍य श्‍लोकों को ध्‍यान से न पढने के कारण ही है।
अगर आप इसी अध्‍याय का 29वां श्‍लोक भी देखते तो आपकी ये शंका स्‍वयं ही समाधित हो जा‍ती।।
श्‍लोक का भावार्थ नीचे दे रहा हूं।।

चरणामन्‍नमचरा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, भीरव:।।

चर जीवों (गाय, भैंस आदि) के लिये अचर (पेड, पौधे) , बडे दांत (सिंह, व्‍याघ्र आदि) वालों के लिये छोटे दांत वाले (हिरण आदि), हांथ वाले जीवों के लिये बिना हांथ वाले जीवों तथा साहसी जीवों के लिये कायर जीवों को भोजन के रूप में बनाया जाता है।

इस श्‍लोक में कदाचित हांथ वाले जीवों को आप मनुष्‍य भी समझ लें तो यह उन जंगली मनुष्‍यों के लिये कहा गया है जो प्रारम्‍भ से ही पशुओं का सा ही जीवन बिता रहे हैं तथा जिन्‍हे ये तक नहीं पता कि मनुष्‍य ज…

तुम्हारी हत्या पर भी रख लेंगे २ मिनट का मौन ।।

(अभागे भारतीय की फरियाद पर सिक-यू-लायर(Sick you Liar, बीमार मानसिकता वाले  झुट्ठे) नेता द्वारा सांत्वना भरे कुटिल उपदेश की तरह पढ़ें)
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अच्छा!!!   वो दुश्मन है? बम फोड़ता है? गोली मारता है?
मगर सुन - दोस्ती में - इतना तो सहना ही पड़ता है
तय है - जरुर खोलेंगे एक और खिड़की - उसकी ख़ातिर
मगर - हम नाराज़ हैं - तेरे लिए इतना तो कहना ही पड़ता है

तुम भी तो बड़े जिद्दी हो -  दुश्मन भी बेचारा क्या करे
इतने बम फोड़े - शर्म करो - तुम लोग सिर्फ दो सौ ही मरे ? (कितने बेशर्म हो तुम लोग)
चलो ठीक है - इतने कम से भी - उसका हौंसला तो बढ़ता है
और फिर - तुम भी तो आखिर १०० करोड़ हो(*) - क्या फर्क पड़ता है?
[(*) ११५ करोड़ में १५ करोड़ तो विदेशी घुसपैठिये हमने ही तो अन्दर घुसाएँ हैं वोटों के लिए]

अच्छा!   समझौते की गाड़ियों में दुश्मन भी आ जाते हैं???
क्या हुआ जो दिल लग गया यहाँ - और यहीं बस जाते हैं
बेचारे - ये तो वहां का गुस्सा है - जो यहाँ पर उतारते हैं
वहां पैदा होने के पश्चाताप में - यहाँ पर तुम्हें मारते हैं (क्यों न मारें?)

क्या सोचता है…

हमें खुशियों भरा जीवन पसन्‍द नहीं आता ।।

मेरी इस रचना की अजीब बात सिर्फ ये है कि इसे लिखा तो गजल के अन्‍दाज में है पर इसमें मैने हिन्‍दी शब्‍दों का भी बहुतायत में प्रयोग किया है जो इस रचना के लालित्‍य को और भी बढा देते हैं।। 
दावा है हमारा कि हर पढने वाला एक बार अपने हृदय पर हांथ जरूर रखेगा या फिर ठन्‍डी आह जरूर लेगा।। 
तो पढिये और ''आनन्‍द'' की इस रचना का आनन्‍द लीजिये।। 




उन्‍हे रीता हुआ दामन पसन्‍द नहीं आता 
हमें खुशियों भरा जीवन पसन्‍द नहीं आता।।


 जरा धीरे से सिसक ऐ मेरे टूटे हुए दिल
 उन्‍हे दिल का करुण क्रन्‍दन पसन्‍द नहीं आता ।।

 चूडियों की खनक बेशक लुभाती है उनको 
जाने क्‍यूं हांथ का कंगन पसन्‍द नहीं आता ।।


हर तरह से उन्‍हें हक चाहिये हम पर लेकिन 
हमारे प्‍यार का बंधन पसन्‍द नहीं आता ।। 


उन्‍हें हर रंग से यारों बडी मोहब्‍बत है 
हमें पर साथियों फागुन पसन्द नहीं आता ।। 


जला देना हमें मरने के बाद गूलर से
न जाने क्‍यूं उन्‍हें चंदन पसन्‍द नहीं आता ।। 


खिजा में जीने की अब हो गर्इ है आदत सी 
हमें आबाद अब गुलशन पसन्‍द नहीं आता ।। 


चले जाएंगे तनही ही हम अपनी मंजिल तक 
हमारा साथ है उलझन, पसन्‍द नहीं आता ।। 


हारकर फिरसे लिखने लग …

कोई भी ग्रन्‍थ अप्रासंगिक नहीं है अपितु हमारे विचार ही अप्रासंगिक हैं।।

प्रिय महक जी
अच्‍छा लगा कि ये सारे तथ्‍य आपकी जिज्ञासा के अंग मात्र हैं।
मैं आपके सारे शंकाओं का समाधान करना चाहूंगा किन्‍तु मेरी लिखने की गति थोडा कम है अत: ये समाधान मैं आपको टुकडो में दूंगा।

सब से पहले मनुस्‍मृति जनित शंकाओं का समाधान प्रस्‍तुत कर रहा हूं।
किन्‍तु यहां किसी भी शंका को समाधित करने से पहले मैं एक बात अवश्‍य चाहूंगा कि आप इन्‍हे समसामयिक युग के दृष्टि कोण से देखें क्‍यूकि कोई भी ग्रन्‍थ अपने प्रणयन के काल की समसामयिक समस्‍याओं के निदान हेतु ही लिखा जाता है जो कि जरूरी नहीं कि हर काल में चरितार्थ हो और दूसरी बात यह कि कोई भी परम्‍परा समाज को सुधारने या सही मार्ग पर ले जाने के लिये आती है, हां ये अलग बात है कि उस परम्‍परा को लोग धीरे -2 रूढि कर देते हैं जो समाज के अहित का कारण भी बनने लग जाती है पर इसमें उस परम्‍परा या उस परम्‍परा का विधान करने वाले लोगों का कोई दोष नहीं निकाला जाना चाहिये।

मै आपको एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूंगा।
सती प्रथा हमारे समाज का अभिषाप मानी जाती है जिसका उन्‍मूलन बडे विवादों के वाद किया जा सका।
इस प्रथा को आज के समय में …