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April, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

समाज में नारी का स्‍थान

कितनी अजीब सी बात है। कहते हैं कि काव्‍य कवि के हृदय से निकलता है। अगर कोई जबरदस्‍ती कविता करना चाहे तो या तो कविता बनेगी नहीं या फिर बनेगी भी तो लिखने बैठो दुखान्‍त काव्‍य और ब्‍यंग काव्‍य बनकर रह जाये।
मेरी इन चार लाइनों के साथ ऐसा ही कुछ हुआ। मेरे एक मित्र नें शाम को मुझे फोन किया और क‍हा , कल मुझे एक सेमिनार में बेटी बचाओ विषय पर बोलना है, कैसे भी करके तुम मुझे रातभर में कुछ लिखकर दो कि मैं वहां शर्मिन्‍दा न होउं।
मरता क्‍या न करता मैं भी लिखने बैठ गया और रात लगभग एक बजे मन कुछ चार लाइनें आ ही गर्इं। अब दोस्‍त ने तो अपना काम चला लिया इनसे पर सच्‍ची परख तो मेरा ब्‍लागर परिवा ही करेगा न। अत: सोचा आप लोगों को दिखाउं ।।
है तो जबरदस्‍ती की रचना पर अगर गलती से अच्‍छी लग जाए तो जरूर बताइयेगा।
         आपका - आनन्‍द

नारी सम्‍मान का विषय हमारे भारत में, आज का विषय नहीं है सदियों पुराना है
गौर करें लोग नारी के स्‍वरूप जननी का, जिससे ही जनमा समाज क्‍या जमाना है  ।।
नारी माता लक्ष्‍मी औ शक्ति भी तो नारी ही हैं, जिनके नियम व्रत का चलन पुराना है
गोंद में पले हैं जिनकी वो धर…

ब्‍लाग जगत पर संस्‍कृत का पहला ब्‍लाग।।

मुझे ब्‍लागजगत पर लिखते त‍था चिट्ठे पढते हुए काफी समय हो गया। इस दौरान मैने लगभग हर भाषा में ब्‍लाग देखे तथा उनमें से जो पढ सकता था पढा भी।
किन्‍तु अबतक मुझे कोई भी ब्‍लाग ऐसा नहीं मिला जो पूर्णतया संस्‍कृत में हो।  हां कुछ ब्‍लाग आंशिक रूप से संस्‍कृत में जरूर मिले जिनमें बहुत महत्‍वपूर्ण सामाग्रियां भी प्राप्‍त हुईं।  कुछ में अच्‍छे मन्‍त्रों का संकलन मिला तो कुछ में मंगल श्‍लोक प्राप्‍त हुए। मगर इसके बावजूद भी कोई भी ब्‍लाग ऐसा नहीं मिला जिसके लेखन का माध्‍यम भी संस्‍कृत ही हो तथा सामाग्रियां भी संस्‍कृत में ही हो जैसा कि हिन्‍दी ब्‍लाग, अंग्रेजी ब्‍लाग तथा अन्‍य भाषाओं के ब्‍लागों पर है।
यह सोंचकर बहुत ही क्‍लेश हुआ। ऐसा नहीं है कि हमारे समाज में या हमारे ब्‍लाग परिवार में कोई भी संस्‍कृत का ज्ञाता नहीं है। मैने अपने ब्‍लाग पर जिनकी प्रतिक्रियाएं प्राप्‍त की हैं उनमें से अधिकांश ने संस्‍कृत में ही टिप्‍पणियां दी हैं जिससे लगता है कि संस्‍कृत में लिख सकने वालों की भी कमी नहीं है। पर फिर भी संस्‍कृत के विषय में इतनी उदासीनता क्‍यूं है यह बात मेरी समझ में अबतक नहीं आ पा रही है।

     …

कर गये बेहोश हमको होश में लाने के बाद।।

मेरी इस कविता में कुछ विशेष बातें हैं जो इसे बहुत खास न होते हुए भी खास बना देती है।
पहली बात, इस कविता में मैने हिन्‍दी के शब्‍दों का प्रयोग बहुतायत में किया है । दूसरी बात जो बहुत खास है वो ये कि मेरी इस रचना में उस शक्‍स का नाम छुपा हुआ है जिसके लिये मैने ये कविता लिखी है। इस कारण से यह रचना अन्‍य रचनाओं में मुझे अधिक प्रिय है। पढकर बताइयेगा कैसी लगी और अगर नाम ढूढ पाये तो वो भी बताइयेगा।
               आनन्‍द

मंजिलें सब मिल गईं अब उनको पा जाने के बाद
जब मिले वो, हो गई पूरी मेरी हर इक मुराद।।

रीझ कर हमसे वो बोले एक दिन, सुनते हो जी!
आज आना पास मेरे सांझ ढल जाने के बाद।।

नंदनवन सा खिल उठा मेरा दिले बीमार जब
दर मेरे भी आया सावन पातझर  जाने के बाद।।

बिक गये हम उनके हांथों, कितने है हम खुशनसीब
क्‍यूं न खुश हों उनके हांथों में चले जाने के बाद।।

कीजिये आराम, हमने आज दिल से कह दिया
विरह के अब दिन गये मौसम बदल जाने के बाद।।

वेणु सी आवाज मीठी है मेरे दिलदार की
कर गये बेहोश हमको होश में लाने के बाद।।

क्रिकेट जगत के भगवान और भारत की शान सचिन को उनके जन्‍मदिन की हार्दिक बधाई

पूरी क्रिकेट दुनिया के बेताज बादशाह, विदेशियों तक के दिलों पर राज करने वाले सचिन तन्‍देलुकर का आज 37वां जन्‍मदिन है  ।
वो यूं तो चाहें तो बडी धूम धाम से इसे मना सकते है पर इस बार वो बडी ही सादगी के साथ पेश आ रहे हैं।
पर ये बात उनके चाहने वालों को कैसे गवारा हो सकती है  ।
आइये हम सब मिलकर हमारे देश के रत्‍न सचिन को उनके जन्‍मदिन की शुभकामनाएं दे और उनके लम्‍बे और सुखमय जीवन की कामना करें।

भगवान उन्‍हें दीर्घायु प्रदान करें
इसी पावन भावना के साथ।
जय हिन्‍द

संस्‍कृत प्रिय मित्रो के लिये मेरा नया चिटठा केवल संस्‍कृत में

आदरणीय एवं अत्‍यन्‍त प्रिय चिट्ठामित्रों
मैने अपना एक नया ब्‍लाग बनाया है जो  केवल संस्‍कृत में ही रहेगा
इसकी प्रविष्टियां भी संस्‍कृत में ही होंगी।
‍किन्‍तु यह संस्‍कृत इतनी सरल होगी कि आप इसे 90फीसदी समझ पाएंगे।
पढियेगा जरूर और विश्‍वास कीजिये इसे पढने के बाद आपको बडी आत्मिक शान्ति का अनुभव होगा कि आपने देववाणी का वाचन किया है।
सम्‍पूर्ण विश्‍व में कहीं भी संस्‍कृत का सम्‍मान कम  नहीं है न हि इसपर विरोध
अत: हम सब मिलकर भारत की आत्‍मा संस्‍कृत के उत्‍थान में योगदान दें इसी शुभेच्‍छा के साथ ब्‍लाग जगत पर मेरा ये नया चिटठा http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/ आप सब को समर्पित

आपका- आनन्‍द

ये गजल नहीं हैं मेरे आंसू हैं

मैने ये गजल उस समय लिखी थी जब कि मैं बडे ही मानसिक दुविधा में रहा करता था।
कदाचित ये बताने की आवश्‍यकता नही है कि वह मानसिक परेशानी कौन सी बात पर थी।
हां सो मैने भी अपने दिल के गुबार कागज पर उडेल दिये और वह जहर ही इस गजल के रूप में प्रकट हो गर्इ।
टिप्‍पणियां दीजियेगा कि मै समझ सकूं कि ये गजल कैसी है।
            आपका - आनन्‍द

ये गजल नहीं हैं मेरे आंसू हैं
दर्दे दिल की मेरे आवाज है ।।

मेरी बरबादियों के मंजर का
बडा अजीब सा आगाज है ।।

बिगड जाती है बात सब अपनी
अपना कुछ अलग ही अंदाज है ।।

गुबार कितना भरा है दिल में
न पूंछिये, ये गहरा राज है ।।

छोड दो आज हमें तनहा ऐ दोस्‍त !
आज तबियत बडी नाशाद है ।।

तोड देता है दिल बेदर्दी से
बडा जालिम मेरा हमराज है ।।

खुश है अब दूर होके वो हमसे
उसकी दुनिया बडी आबाद है ।।

मोहब्‍बत की गजल है ताजमहल
हम मगर आंसूओं के ताज हैं ।।

--
ANAND

मैं चाहता हर एक को सीने से लगाना।। सभी भारत प्रेमियों से अनुरोध है, इसे अवश्‍य पढें।।

देश के अमर सपूतों की श्रद्धांजलि में अर्पित ये काव्‍य सुमन मेंरे हृदय का उद्गार है।
मां भारती के प्रति इतनी अगाध श्रद्धा और इतना प्‍यार है कि शब्‍दों मे व्‍यक्‍त करने का सामर्थ्‍य नहीं बन पा रहा
फिर भी मन की कुछ पवित्र भावनाओं ने लेखनी की शरण ले ली और यह छोटा सा काव्‍य फूट पडा ।
सभी भारत प्रेमियों से अनुरोध है, इसे अवश्‍य पढें और अपने अमूल्‍य विचार टिप्‍पणियों के द्वारा प्रेशित करें।
।।जय हिन्‍द।।
               आपका - आनन्‍द

ये भावना है मेरी या कि दिल का बहाना
मैं चाहता हर एक को सीने से लगाना  ।।

मा भारती का पुत्र हूं हिन्‍दू न मुसलमां
मैं प्‍यार उनसे करता हूं जो लोग है इन्‍सां
अब कौन हैं इन्‍सान ये तय कर ले जमाना
मैं चाहता हर एक को सीने से लगाना ।।

मजहब मेरा ईमान है भगवान है भारत
समृद्ध हो ये देश अपना है यही नीयत
सोने की चिडिया हिन्‍द को फिर चाहूं बनाना
मैं चाहता हर एक को सीने से लगाना ।।

जिसमें हुए पैदा, सम्‍भाला जिसमें ये जीवन
आओ सभी इस देश को अर्पित करें तन- मन
''आनन्‍द'' तू इस देश की खातिर ही मर जाना ।।''आनन्‍द'' बस, इस देश की खातिर ही…

मां भारती के रक्षार्थ सुकवियों का आह्वान

फिर ये भारत संकट में है
फिर दुश्‍मन ताक विकट में है
जागो तुम शब्‍द ब्रह्म फिर से
भेदो अरि दुर्ग निकट निकट में है।।


ANAND

आज फिर अपना बना लेते तो अच्‍छा होता ।

कहने की जरूरत नहीं है कि अपनी इस रचना में मैं क्‍या कहना चाहता हूं। पढकर आप सब खुद ही समझ जाएंगे। जिनको इस गजल से कुछ एहसास जगें या फिर कोई पुरानी बात या पुराने हसीन दिन याद आ जाएं वो टिप्‍पणी जरूर लिखेंगे इसी में मेरी इस गजल की सार्थकता है।।                आपका-आनन्‍द
आज फिर अपना बना लेते तो अच्‍छा होता । गुनाह मेरे भुला देते तो अच्‍छा होता ।।
अपने नाजुक लबों से एक बार फिर मेरा तडपकर नाम बुला देते तो अच्‍छा होता ।।
कहीं हम छूट न जाएं, बडा लम्‍बा है सफर तुम अपना हाथ थमा देते तो अच्‍छा होता ।।
कैसे भूलें भला हम तुमको एक पल को भी तरीका तुम ही बता देते, तो अच्‍छा होता ।।
आज फिर एक बार मेरे बीमारे दिल पर थोडी सी दवा लगा देते तो अच्‍छा होता ।।
सजा तुमसे जुदाई का मिले इससे बेहतर जहर हांथो से पिला देते तो अच्‍छा होता ।।
कहीं ऐसा नहो, हो जाएं दूर हम तुमसे अपने दामन में छुपा लेते तो अच्‍छा होता ।।
टूटकर हम बिखर जाएं तुम्‍हारी बाहों में अपने दिल में पनाह देते तो अच्‍छा होता ।।

--
ANAND

नूतन प्रभात की प्रथम अंशु का पावन आह्वान

कविवर आर्त की ये रचना हमें हर हाल में सकारात्‍मक सोंच रखने को प्रेरित करती है
पढिये- अच्‍छा लगेगा।
टिप्‍पणी जरूर करियेगा कि मै जान सकूं कि आपको ये रचना कैसी लगी।।


निर्मल पथ के धीर बटोही व्‍यथित ठहर मत जाना
जीवन है संग्राम अहो! फिर क्‍यूं, कैसा घबराना  ।।

कुश- कण्‍टकाकीर्ण मग दुस्‍तर मंजिल तक अनजाना
कानन विजन पन्‍थ श्रम संकुल तदपि न तुम उकताना
विपदाओं के वक्ष फाड नभ में निज निलय बनाना  ।।

बर्फीली चट्टानों में जो क्षुधित यामिनी जगते
जिन्‍हें तोप -गोलों के गर्जन मधुर गीतमय लगते
अनिमिष दृगों देखते जो निज गौरव स्‍वप्‍न सुहाना  ।।

विशद विपर्यय, विप्‍लव भी विचलित न जिन्‍हें कर पाते
विशिका, विशिष सेज पर भी जो श्रुति संदेश सुनाते
उन प्रचण्‍ड पुरूषार्थ- रतों को निज आदर्श बनाना  ।।

काल चक्र अविरल, अविजित, है उससे कौन बचा है ?
तदपि चतुर्दिक दम्‍भ, स्‍वार्थ, तृष्‍णा का रोर मचा है
नरशार्दूल! न विषयी श्‍वानों मध्‍य श्रेय विसराना  ।।

रह न गये जो चक्रवर्ति नृप त्रिभुवन जयी कहाये
अगणित भूपति, सन्‍त अन्‍त धरणी की क्रोड समाये
अन्तिम शरण मरण है बाउर! फिर किस पर इतराना  ।।

सम्‍वत् सहस विषय जो भोगे, क्‍या वे तृप्‍…

ये रचना आप सभी ब्‍लागर्स को समर्पित है- टिप्‍पणी के रूप में अपने आशीर्वाद जरूर दीजियेगा

ब्‍लाग जगत के सभी ज्‍येष्‍ठ ब्‍लागर्स को मेरी तरफ से अभिनन्‍दन के रूप में मै अपनी ये रचना यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं।
मैं आप सभी का आभारी हूं जिन्‍होंने मुझे समय समय पर अपनी टिप्‍पणियों के द्वारा मार्ग दर्शन दिया
ब्‍लाग जगत पर मेरे सफर की शुरूआत सन् 2009 में हुई पर सक्रिय न होने के कारण कोई खास पहचान न बन पाई
पहली बार जब भाई श्री मानिक जी ने मुझे स्‍वागत की टिप्‍पणी लिखी तो मैं भाव विभोर हो गया
तब से लेकर आज तक प्रयास यही रहा है कि आप सब को अपनी रचनाओं तथा अन्‍य कवियों की श्रेष्‍ठ रचनाओं द्वारा आनन्दित करता रहूं
अब ये आप तय करेंगे कि मै इसमें कहां तक सफल हो पाया हूं
ये रचना भाई श्री मानिक जी, जयराम विप्‍लव जी, बहन संगीता जी, श्री अजय कुमार जी, संजय जी, दीप श्रीवास्‍तव जी,आदरणीय सुमन जी , रौ शन जायसवाल जी  ब्‍लागवाणी के समस्‍त कार्यकर्ताओं, जनोक्ति
के सभी कार्यकर्ताओं,चिट्ठा जगत, भडास वाणी तथा उन सभी लोगों को समर्पित है जिनका सहयोग निरन्‍तर मुझे प्राप्‍त होता रहा। जो हैं तो मुझसे कहीं 
अच्‍छे लिखने वाले फिर भी मेरे ब्‍लाग को पढकर तथा मेरे ब्‍लाग का अनुसरण कर के मेरा…

सोचो क्‍या खोया, क्‍या पाया?

कवि आर्त की ये रचना हमें हर पल ये ध्‍यान कराती है कि अपना पेट तो पशु भी पाल लेता है | अगर हम सिर्फ अपने तक ही सीमित रहे तो हममे और पशुओं मे क्‍या भेद रह जायेगा|
हमे अपने सुखों के साथ साथ ये भी देखना है कि कहीं हमारी विलासिता किसी के दुख का कारण तो नहीं बन रही
कहीं मानव मूल्‍यों से भटक तो नहीं गये है
और अगर एसा है तो ध्‍यान रहे वो अन्‍तर्यामी हमारी सारी गतिविधियां देख रहा है और हमारे हर एक पल का हिसाब लिख रहा है| जितना हम यहां करेंगे उतना हमें भरना भी पडेगा


सोचो क्‍या खोया, क्‍या पाया?

किन मूल्‍यों के बदले हमने एक संवत्‍सर और गवाया ?
कितने आपदग्रस्‍त जनों को सत्‍वर बढकर दिया सहारा ?
अबतक कितने असमर्थों, दुखियों का दूर किया दुख सारा ?
सृजनहार के चिन्‍तन में कब रूध्‍दकण्‍ठ दृगबिन्‍दु बहाये ?
अब तक कितने बार सुधी, विदुषों के संग दिन रैन बिताये ?
कितने संकट ग्रस्‍त मानवों का हमने संत्रास मिटाया ??
किन मूल्‍यों के बदले हमने.............................

क्‍या सन्‍मति की चाह त्‍यागकर सम्‍पति के ही रहे पुजारी ?
वित्‍त- वासना- लिप्‍त रहे नित, कर्म विमुख, हो मिथ्‍याचारी ?
उच्‍चाकांक्षाओं की वेदी पर कितने अ…

किसी अपने से दूर हो गये हैं या कोई बहुत अपना आपसे दूर हो गया है तो इसे जरूर पढियेगा

मेरी ये रचना उन दोस्‍तों को समर्पित है जिन्‍होंने अपने जीवन में कभी न कभी किसी से प्‍यार किया है और किसी कारण वश उनको अपने प्‍यार से दूर हो जाना पडा
उनको भी समर्पित है जिन्‍होंने प्‍यार भले न किया हो पर प्‍यार करने वालों का सम्‍मान दिया है
और उनको भी समर्पित है जो  प्‍यार का मतलब जानते हैं


इश्‍क का भूत जब बीमार के सिर चढता है
खयालों के खिलौने आशिके दिल गढता है

बिना इबादत किये ही फकीर बन जाता है
माशाअल्‍लाह । निगाहें यार की जो पढता है

घूट जामे मोहब्‍बत की चखी हमने है हुजूर
जितनी थोडी सी पियो उतना नशा चढता है

जमाना अपना भी था साथ जब वो थे मेरे
छोडो, अब बीती बातें कौन याद करता है

बन गये आज जिन्‍दा लाश उनकी ठोकर से
चोट कोई करे कितनी, क्‍या फरक पडता है

पास आने को उनसे हो गये हम उनसे दूर
सुना था हमने कि दूरी से प्‍यार बढता है ।।

ये रचना आपको कैसी लगी ये जरूर बताइयेगा
आपके प्रोत्‍साहन से मेरी कलम की ता‍कत बढती है
आप सभी को बहुत शुभकामनाएं और धन्‍यवाद

जनोक्ति ब्लॉग द्वारा नक्सलवाद की समस्या पर पूछे गए कुछ सवालों पर विचार

Q.1- how do u see the naxalites in present time ?

महोदय नक्सलवाद आज भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है
इसे हम देश की गन्दी राजनीति का परिणाम मान सकते हैं
हर देश में कहीं ना कहीं दुर्व्यवस्था होती है पर उसका समाधान भी वहां की जनता और सरकार मिलकर ढूंढ ही लेते हैं
पर हमारे भारत में जहां सबके लिए समान अधिकारों की बात की जाती है वहीँ किसी ना किसी मामले में जनता के उत्पीडन के मामले सामने आ ही जाते हैं
नक्सलवाद भी इन्ही उत्पीड़ितों में से कुछ के द्वारा बगावत से उत्पन्न हुई समस्या है

Q.2- is this the right way of revolution ?

हालांकि हर बगावती ये मानता है की उसके द्वारा उठाया गया कदम ठीक ही है
उसे भी अपने अधिकारों के लिए  लड़ना चाहिए
पर ये लड़ाई किसके खिलाफ हो ये जरूर तय कर लेना चाहिए
मै नक्सलियों की इस बात का तो समर्थन करता हूँ की वो अपने अधिकारों के लिए लड़ें पर उनकी ये लड़ाई भारत सरकार के खिलाफ हो तो उचित है
इसमें निर्दोष जनता को प्रताड़ित करना कतई उचित नहीं है अतः मै नक्सलवादियों के इस तरीके से बिलकुल भी संतुष्ट नहीं हूँ
अपने अधिकार पाने के लिए पूरे समाज को दाँव पर लगाना कतई उचित नह…

आविष्कारों की लिस्ट में भारत के नाम इतने कम आविष्कार- क्यूँ

शताब्दियों से सम्पूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व करने वाला भारत आधुनिक आविष्कारों की लिस्ट में कदाचित अपना अस्तित्व भर बनाए हुए है
प्राचीन काल में जहाँ हमने इतने सारे संसाधनों का विकास किया वहीँ आधुनिक काल में हमारे आविष्कारों की संख्या मंद पड़ गयी
ऐसा क्यूँ?
क्या हमारी बुद्धि में वो पैनापन नहीं रहा
या हमारे विद्वानों ने मष्तिस्क का प्रयोग बंद कर दिया
या फिर हममे अब वो छमता नहीं रही
आइये कुछ तथ्यों पर गौर करें
ज़रा इतिहास की ऊँगली पकड़ कर अतीत की सैर करते हैं
विश्व का आदि ग्रन्थ वेद जिनमे देवताओं से लेकर पेड़- पौधों, आदि तक की वंदना की गई है
क्यूँ? क्या आवश्यकता थी इसकी?
क्यूंकि हमारे मनीषियों को यह पता था की वृक्ष भी जीवन धारण करते हैं
उनमे भी अनुभव करने की छमता होती है
एक उदाहरण देता हूँ- संस्कृत कोष में वृक्ष के लिए पादप शब्द का प्रयोग हुआ है
पादप की व्युत्पत्ति पादेन पिबति इति पादपः अर्थात जो पैरों से पीता है वो पादप
पीने का काम तो वाही कर सकता है जिसमे जीवन हो

आगे बढ़ते हैं
रामायण विश्व का आदि काव्य है
रामायण में सरयू को पार करने के लिए नौका का प्रयोग किया गया है जो आज की नौकाओ व समुद्री जहाज़ों का प…

दोस्ती

हर पल फुहार प्रेम का झरता है जो दिल पर
यारों उसी फुहार का है नाम दोस्ती...

जो दूर कितने ही हों पर, दिल में पनपती है
बंधन अटूट प्यार का है नाम दोस्ती

ये द्वेष रहित प्रेम भरे सैकड़ों पुष्पों
की एक बनी हार का है नाम दोस्ती


जिस मिलन की रुत में सभी लोगों के दिल मिलें
उस मौसमी बहार का है नाम दोस्ती


कहता "आनंद" कुछ नहीं संसार में ऐ दोस्त
बस तेरे मेरे प्यार का है नाम दोस्ती

है दोस्ती इंसान का भगवान् से मिलन
उस सांवले सरकार का है नाम दोस्ती


दुर्भाग्य -ऐ- उत्तरप्रदेश

भारतकेसबसेप्रमुखप्रदेशोंमेंसेएकहैउत्तरप्रदेश
इसकामहत्त्वआपइसीसेजानसकतेहैंकीहिन्दुओंकेप्रानाराध्यभगवान्श्रीरामचन्द्रऔर
पुराणपुरुषोत्तमभगवान्श्रीकृष्णदोनोंनेइसीप्रदेशकीधरापरजन्मलियाऔरअपनीबाललीलाएंकीं
इसीभूमिपरगौतमबुद्धकाजन्महुआ
इसीधरापरचन्द्रशेखरआजादजैसाभारतपुत्रपैदाहुआ
परइतनीमहानविभूतियोंकीजन्मदात्रीयेधराआजगन्दीराजनीतिकाशिकारहोगईहै
यहाँअबनाकेवलअलगअलगधर्मकेनामपरअपितुअलगअलगजातियोंकेनामपरभीसियासतहोरहीहै
यहाँसंसाधनकेनामपरनेताओंकेवादेऔरप्रपत्रोंमेंबंदआंकड़ेहैंजोइतिहासमेंअभिलेखोंकीजगहलेनेवालेहैं
इन्हीआंकड़ोंकोहमारीआनेवालीपीढियांपढ़ेंगीऔरउत्तरप्रदेशकेगौरवमयअतीतकीसराहनाकरेंगी
यहाँपार्कोंपरकईसौकरोड़मरम्मतमेंऔरअपनीमूर्तियाँलगवानेपरखर्च

क्या लिखूं ग़ज़ल

हर ग़ज़ल कुछ कहती है
ये ग़ज़ल मैंने तब लिखी थी जब मै शायद ग़ज़ल का मतलब भी नहीं समझता था..
उन दिनों मेरे ऊपर शायद शनि की कुदृष्टि थी..
हर तरफ से हार और घर में अपनों से ही जिल्लत
जब आँखों से आंसू निकलना बंद हो गए तो लेखनी ने रोना शुरू किया
और फिर अपनी व्यथा कथा लिखने के चक्कर में दिल से कुछ ऐसी सच्चाई निकली जो पूरी दुनिया पर लागू होती है.. 
इन में कुछ कठिन शब्दों का भी प्रयोग किया है
जहाँ भाव ग्रहण करने में कठिनाई हो, टिप्पड़ी में लिख दीजियेगा




आज हूँ विकल, लिख रहा ग़ज़ल

जग की दुर्दशा, द्वंदों में फंसा 
दलदल में धंसा जैसे मर्कट दल

तप्त आसमान, हांफ रहे स्वान 
पथ हुआ अनजान, खो रही मंजिल

थके- थके पाँव, धूप और छाँव 
उलटे पड़ते दाँव, हारा हुआ दिल 


हर तरफ अशांति, मन में छिपी भ्रान्ति
मलिन होती कान्ति, जैसे गन्दा जल 


हाय महात्राश, यम का कड़ा फाँस
मिटती सी हर स्वांस ना रहेगी  कल


क्या लिखूं ग़ज़ल

श्रद्धांजलि

ये श्रद्धांजलि उनको समर्पित है जो यूँ तो हमारी कुछ न थीं, एक पडोसी के सिवा; पर वो हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग थीं
कल सुबह एक दुर्घटना में उनका देहांत हो गया
मै मामा जी के यहाँ था
मुझे ये सूचना मेरी माँ ने फ़ोन पर रोते हुए सुनाया
तब से मन बड़ा व्यग्र है
उनका चेहरा रह रह कर आँखों में आ जाता है
लगता है जैसे अभी वो घर से बाहर निकलेंगी और कहेंगी
बेटा कब आये मामा जी के यहाँ से ?
तुम्हारी तबियत अब कैसी है?
पर अगले ही छड़ ध्यान आता है की वो अब इस असार संसार में नहीं हैं
और मन चीत्कार कर उठता है
उनके इस तरह से असमय में चले जाने का खेद सिर्फ मेरे ही परिवार में नहीं बल्कि पूरे मोहल्ले में है
हो भी क्यूँ न
वो थीं ही इतनी अच्छी की उनकी जगह कोई नहीं ले सकता
आज ऊपर वाले के न्याय पर बहुत गुस्सा आ रहा  है
वो हमेशा अच्छों को ही क्यूँ अपने पास बुलाता है
क्या दुनिया सिर्फ बुरे लोगों के लिए ही है ?
पर इश्वर के आगे किसकी चलती है

यहाँ मै उनकी श्रद्धांजलि में खुद की ही एक कविता-सुमन  अर्पित कर रहा हूँ

कैसा  अजब जहाँ है, कैसे नियम यहाँ हैं
पर हितव्रती महानर, दुःख द्वंदों में जकड़ा है

जग की है जो जरूरत, करुणा दया की मूरत
परह…